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Gadarenes Ke Iss Paar

खुश था मैं ज़िन्दगी में। पता नही किस मनहूस घड़ी ने दस्तक दे दी। दम घूँटता है इस अंधेरे में। इन मुर्दों के बीच जीवित होने का एहसास गूमसा गया है। इन बची-कूची हवाओं में भी मौत की बदबू आती है। कैसे सांस लू मैं? इन लाशों का इत्र मेरे बदन की गंध बन चुका है। नजाने क्या क्या करवटे है – कभी मांस तो कभी रक्त। यही मेरी रोटी और यही मेरी दाल। “अब नही होता, बस करो!” ये मैं किसे कहु? किसके न्यालाय में अर्ज़ी करू? किस विधिवक्ता के सामने हाँथ जोडू? किसका हाँथ थामू? मैं तो अपने में ही बंध चुका हूं, अपने ही कैदखाने में बंधा हुआ हूं। दो हज़ार की तादाद में इन्हें अपने जिस्म में ले चलता हूं। वो तो बस मेरा तमाशा देखते हैं। बेबस, लाचार हो चुका हूं, इन जंज़ीरों में बंध चुका हूं।

कभी कीड़े-मकोड़े तो कभी खुद का बदन – ये भूक भी कैसी है? मेरे ही हाँथ चलाकर मेरे ही पैरों पर कुरहाडी मारते है। गुफा के बाहर जाऊ तो लोग डर जातें है, मुझे पागल कहतें है। कुछ अच्छे भी हैं जो मुझे रोकने की कोशिश करतें है। लेकिन सारी कोशिशें बेकार है। उस मौत के कुएं की तरफ बस दौड़ता चला जाता हूं। पागलों की तरह बस दौड़ लगाता हूँ, लेकिन किसीके हाँथ नहीं आता, और वो मेरे अंदर खड़े-खड़े बस तमाशा देखते रहते है। वे चिल्लाते है, लोगों को डराते है और मेरे ही हाथों से मुझे तकलीफ देते है। रूह कांप उठती है! जनाब, मेरी नहीं बल्कि उनकी जो मुझे देख कर अपने बच्चों की आँखो पर हाँथ रखते है, उन्हें दूर ले जाते है। मेरी रूह ही कहा है? इन जालिमों ने उसे अपना घर बना लिया है।

एक दफा, मुझे याद है, उस ऊँचे पहाड़ की ऊँची चोंट पर एक विशाल पत्थर पर मुझे बिठा दिया। कीलसा एक पत्थर दिखा और बस उठा लिया। लेकिन किसे पता था की उस पत्थर से मैं खुद को लहूलुहान कर दूंगा? लेकिन तब एक आवाज़ आयी। इस मृत आत्मा मे अभी भी एक आवाज़ थी। मगर कैसे संभव है? मेरी आत्मा तो बंधी हुई है? इन दो हज़ार आवाज़ों के अलावा एक और आवाज़ थी जो बिलकुल अलग थी। वो तो ग्याड़रींस के उस पार गलील के समंदर से आ रहा थी, लेकिन सुनाई तो मेरी आत्मा में आ रही थी। पता नहीं ये लोग हड़बड़ा क्यों गए। मन विचलित होकर इन विचित्र प्राणियों के पैरों के नीचे की ज़मीन फिसल क्यों गयी? एकदम से जल्द मचाने लगे जैसे की कोई मसीहा आ गया हो। वैसे तो बड़े शेर बन कर घूम फिरते थे, नजाने एक चरवाहे को देख कर एकदम से भेड़ी क्यों बन गए? बाकायदा उनके पैरों पर गिर कर उनकी आराधना करने लगें। आज सूर्योदय कहा से हुआ है?

खैर, क्या फरक पड़ता है – दिन हो या रात, मेरी ज़िन्दगी तो नरक ही है। लेकिन फिर आ गया वो सवेरा जिसने मेरे अंदर एक उम्मीद जगाई। उसका बढ़ता हुआ हर एक कदम मेरे अंदर के अंधियारे को थोड़ा थोड़ा कर के भगा रहा था। कौन हु मैं उसके लिए की वो गलील से इस झील को पार कर ग्याड़रींस में आ गया है? मानो जैसे फ़रिश्ता नहीं बल्कि फ़रिश्ते बनाने वाला आ गया हो। आँखो से देख रहा था लेकिन उसे पुकारने की ताकद नहीं थी, मानो की जैसे मेरे जीभ को लकवा मार चूका हो – ये ज़ालिम जो मेरी आत्मा को घेर कर रखे हुए थे। मैं चीख रहा था लेकिन किसी को सुनाई नहीं दे रहा था। सुना तो बस वो तूफ़ान को डांटने वाले ने। तभी तो झील के इस पार उसके कदम चलने लगे। मेरी छोड़ो, मेरे अंदर के ये बुज़दिल भी समझ गए की आज उद्धार का दिन है।

बस एक ही आवाज़, एक ही पुकार, एक ही आदेश, और मैं चल पड़ा। मानो जैसे की पिंजरे मे बंध पंछी की वह पहली उड़ान। दिलखोल, मस्त-मगन हो कर जो मैं चल पड़ा की रुकने का नाम ही नहीं लिया। लिया तो बस उसका पाक-साफ़ नाम, जिस नाम से वो पिंजरे की कुंडी खुल गयी और मैं सूरज की मनमोहक किरणों को फिर एक बार महसूस करने लगा। नग्न था मैं लेकिन उसने मेरी लाज ढक ली। उसके चरणों मे मैं बैठा रहा ताकते उसके नूर को। इधर भय ने गैरो को घेर रखा हुआ था। ऐसा चमत्कार ग्याड़रींस मे थोड़े ही हुआ था ! लेकिन उसे जाने के लिये कहा गया क्योकि इन्होने देखी नहीं थी ऐसी अनहोनी को संत मे बदलते हुए। फिर गया वह झील के उस पार। लेकिन वापसी से पहले एक संदेश दे गया। मैं घर लौटा और उसकी महिमा करने लगा। करीब-करीब सभोने मेरी गवाही सुन ली। इस महान व्यक्ति ने मेरे दिल का बोज जो निकल दिया था। अब मेरे दिल मे अंधियारे नहीं बल्कि उस उजाले का आनंद मचलता है।